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Newsleaders : राष्ट्रपति-राज्यपाल के पास अटके विपक्ष शासित 4 राज्यों के 33 बिल, राष्ट्रपति ने क्यों पूछे सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल ?

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देश में केंद्र और राज्यों के बीच जारी संवैधानिक तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है, न्यूज लीडर्स का सटीक विश्लेषण

Newsleaders : राष्ट्रपति-राज्यपाल के पास अटके विपक्ष शासित 4 राज्यों के 33 बिल, सुप्रीम कोर्ट ने समयसीमा न देने पर भी की टिप्पणी,

न्यूज लीडर्स विशेष

देश में केंद्र और राज्यों के बीच जारी संवैधानिक तनाव एक बार फिर सुर्खियों में है। विपक्ष शासित चार राज्यों के कुल 33 विधेयक अभी भी राज्यपालों और राष्ट्रपति की मंजूरी का इंतज़ार कर रहे हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को साफ कर दिया कि अदालत गवर्नर या राष्ट्रपति को बिल मंजूरी के लिए कोई समयसीमा लागू नहीं करा सकती, लेकिन बिलों को अनिश्चितकाल तक रोक कर रखना भी उचित नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा है कि वह राज्य संसदों में पारित हुए विधेयकों को मंज़ूरी देने के लिए राज्यपाल या राष्ट्रपति को कोई समयसीमा तय नहीं कर सकती, लेकिन उसने यह भी स्पष्ट किया कि बिलों को अनिश्चितकाल तक ‘लटका’ नहीं रखा जाना चाहिए। इस फैसले की प्रासंगिकता इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि चार विपक्षी-शासित राज्यों में लगभग 33 बिल अभी तक राज्यपाल या राष्ट्रपति की अनुमोदन का इंतजार कर रहे हैं।

1. लंबित विधेयकों का हाल.》》


कुल 33 बिल चार विपक्षी-शासित राज्यों में लंबित हैं।
• विभाजन:
• पश्चिम बंगाल: 19 बिल
• कर्नाटक: 10 बिल
• तेलंगाना: 3 बिल
• केरल: कम से कम 1 विधेयक


2. कुछ प्रमुख लंबित विधेयक.》》


• कर्नाटक में एक विवादित बिल है जिसमें मुसलमानों को सिविल वर्क्स के ठेकों में 4% आरक्षण देने का प्रस्ताव है।
• तेलंगाना में अन्य पिछड़ा वर्ग आरक्षण बढ़ाने से जुड़े बिल लंबित हैं। खासकर स्थानीय निकायों में पिछड़ा वर्ग को 42% आरक्षण देने की मांग।
• केरल में विश्वविद्यालय कानून  में संशोधन के बिल, जैसे कि वाइस-चांसलर नियुक्ति और विश्वविद्यालयों के चांसलर्स की संरचना, राज्यपाल की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं।

राष्ट्रपति ने क्यों पूछे सुप्रीम कोर्ट से 14 सवाल ?


3. सुप्रीम कोर्ट का रुख.》》


कोर्ट ने कहा कि समयसीमा नहीं लगाई जा सकती, लेकिन राजभवन यह बिल “हमेशा के लिए अटका” नहीं रख सकता।
• यदि देरी बहुत लंबी हो जाए, तो मध्यम न्यायिक समीक्षा हो सकती है।
• कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 142 के तहत “मान लिया गया मंजूर देना संभव नहीं है क्योंकि इससे एक संवैधानिक पद राज्यपाल/राष्ट्रपति की भूमिका में हस्तक्षेप हो सकता है।

4. राज्य सरकारों की चिंता और प्रतिक्रिया.》》


• पश्चिम बंगाल विधानसभा अध्यक्ष बिमन बनर्जी ने कहा है कि ऐसे बिल “बिना स्पष्टता के लंबित” रहते हैं तो उनकी अहमियत घट जाती है।
• राज्य सरकारों का यह तर्क है कि इन बिलों को पास किया गया है, बहस हुई है, जनता की सहमति ली गई है। इसलिए मंजूरी में देरी से लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रभावित होती है।
• लेकिन गवर्नर/राष्ट्रपति को यह अधिकार है कि वह बिल को मंजूर करें, अस्वीकृत करें, या सुझावों के साथ वापस भेजें।

●》निष्कर्ष / विश्लेषण.》》

यह स्थिति विधायी-कार्यपालिका तनाव को दर्शाती है: विपक्षी शासित राज्य सरकारें बिल पारित कर रही हैं, लेकिन संविधान के उच्च पदाधिकारियों राज्यपाल या राष्ट्रपति की देरी इसे पूरी तरह लागू होने से रोक रही है।

सुप्रीम कोर्ट का दृष्टिकोण संविधान-समर्थक बैलेंस की ओर इशारा करता है। वह गवर्नरों / राष्ट्रपति को पूरी आज़ादी देने पर सहमत नहीं है; लेकिन साथ ही यह भी नहीं कहती कि कोर्ट उन्हें समयसीमा के अंदर काम करने के लिए मजबूर कर दे।

अगर ये 33 बिल लंबित रहते हैं, तो जनहित की नीतिगत स्थानीय महत्व वाली पहलें प्रभावित हो सकती हैं। ख़ासकर वे विधेयक जो आरक्षण, शैक्षणिक सुधार और समावेशी विकास जैसे विषयों पर आधारित हैं।

यह मामला भविष्य के लिए एक मिसाल बन सकता है। अन्य राज्यों में भी ऐसे बिल हो सकते हैं, और कोर्ट की सीमित समीक्षा की क्षमता यह दिखाती है कि न्यायपालिका कितनी सक्रिय हो सकती है, लेकिन उसकी ताकत सीमित है।

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